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बुधवार, अप्रैल 27, 2016

घाटियों में मुझे उतरना है

ज़िन्दगी में जो मेरे लफड़ा है
रह्म का ही तुम्हारे जाया है

वक़्त कोई बुरा नहीं होता
मान जाओ जो यह तो अच्छा है

बुज़्दिलों लड़ रहे हो ऐसे के
जूँ रक़ाबत तुम्हारा पेशा है

कुछ भी सोचा न जड़ दिया तुह्मत
है वो आशिक़ के इक लफंगा है

चोटियों की है नाप ले ली अब
घाटियों में मुझे उतरना है

कब ख़ुदा हो गया पता न चला
संग मैंने जिसे तराशा है

एक ग़ाफ़िल पे वार करते हो
जानकर यह भी के तुम्हारा है

-‘ग़ाफ़िल’
(फोटो गूगल के सौजन्‍य से)