मेरा फोटो

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें

शनिवार, अगस्त 29, 2015

सारे मेरे तन के छाले हैं साहिब

जो भी दिखते काले काले हैं साहिब
सारे मेरे तन के छाले हैं साहिब

किसको है मालूम कि हम इन हाथों से
चावल भूसी साथ उबाले हैं साहिब

रात गयी सो बात गयी की तर्ज़ पे हम
सह सह करके सदियां टाले हैं साहिब

तीरे नज़र चलाकर फिर मुस्का देना
आपके ये अंदाज़ निराले हैं साहिब

आप लड़ाओ पेंच न हमको पता चले
क्या हम इतने भोले भाले हैं साहिब

ग़ाफ़िल को चलना ही केवल सिखला दो
उड़ने को यूँ भी परवाले हैं साहिब

-’ग़ाफ़िल’