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शनिवार, फ़रवरी 06, 2016

मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

सच है के तुझसे कोई रिश्ता नहीं
जी तेरे बिन पर कहीं लगता नहीं

है तस्सवुर ही ठिकाना वस्ल का
इश्क़ मुझसा भी कोई करता नहीं

ये भी है तीरे नज़र का ही कमाल
दिल है घाइल उफ़्‌ भी कर सकता नहीं

दर्द है गर तो दवा भी इश्क़ है
इश्क़ सा कुछ और हो सकता नहीं

क्या करोगे आस्तीनों के सिवा
साँप अब दूजी जगह पलता नहीं

घूमता हूँ शह्र की गलियों में पर
मुझको तेरे सा कोई जँचता नहीं

और मक़्ता देखिएगा-

दाद तो ग़ाफ़िल को मिल जाएगी मुफ़्त
मुफ़्त का खाया मगर पचता नहीं

-‘ग़ाफ़िल’