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रविवार, अगस्त 02, 2015

देखिए क्या था मैं और क्या रह गया

एक मंज़िल था अब रास्ता रह गया
देखिए क्या था मैं और क्या रह गया

ख़त से मज़मून सारे नदारद हुए
अब लिफ़ाफ़े पे केवल पता रह गया

घर के अफ़्राद जाने कहाँ खो गए
मैं ही तस्वीर सा बस सजा रह गया

इस क़दर हैं ज़माने की ख़ुदग़र्ज़ियाँ
गो के ज़र से ही बस वास्ता रह गया

आईने का वो गुस्सा अरे बाप रे!
उसको देखा तो बस देखता रह गया

आपने बज़्म से जब उठा ही दिया
अब मुझे और कहने को क्या रह गया

कौन है मेरी बर्बादियों का सबब
सोचने जो लगा सोचता रह गया

आज ग़ाफ़िल पे तुह्‌मत लगी है के वो
बज़्म में बेवजह बोलता रह गया

-‘ग़ाफ़िल’